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कल्चुरी  वंश का इतिहास- एक झलक

छत्तीसगढ़ के प्राचीन इतिहास में हैहय वंश , कल्चुरी राजवंश का प्रमुख स्थान रहा। इस अतिप्राचीन राजवंश का आदि स्थान पहले महीष्मति और पश्चात जबलपुर के निकट त्रिपुरी था। इसी त्रिपुरी के कल्चुरी राजवंश की एक लहुरी शाखा ने कालांतर में छत्तीसगढ़ राज्य स्थापित किया। मध्य प्रांत का पूर्वी हिस्सा महाभारत काल में महाकौशल कहलाता था और यहां के शासक हैहयवंशी कहलाते थे। कल्चुरियों की वंशावली कोकल्पदेव से आरंभ होती है , जिसका काल 875 ई. के आसपास माना जाता है । कल्चुरियों ने सन 248 ई. में अपना नया संवत चलाया था।जो लगभग 1000 वर्ष तक चलता रहा ।कल्चुरी वंश के शासक मुग्धतुं जिनका शासनकाल 900-925 ई. के बीच माना गया है , उनके दो पुत्र बालहर्ष और केउर हर्ष थे । ये दोनों भाई एक के बाद एक गद्दी में बैठे , उन्ही मुग्धतुं राजा के कुछ भाइयों को बिलासपुर जिले के कुछ मंडल दिए गए ।

कल्चुरीवंश का शासनकाल में कलिंगराज 900 ई. 1010 ई. के बीच था। कलिंगराज की मृत्यु के पश्चात कमलराज ने 1020 ई. 1045 ई. के मध्य शासन किया। अपने अद्भुत प्रभाव से अपनी सामरिक क्षमता और भौगोलिक सीमा को विस्तार देने में वे सफल रहे। इसके पश्चात रत्नराज प्रथम 1045 ई. - 1066 ई. के मध्य शासन किया । प्रथम जाजल्ददेव के रतनपुर शीलालेख में कमराज के पुत्र का नाम रत्नराज के रूप में मिलता है। सन 1045 ई. में कमलराज की मृत्यु हो गई तदोपरांत उसका पुत्र रत्नराज राज्य का उत्तराधिकारी बना । रतनपुर शाखा के कल्चुरी शासकों में रत्नराज प्रथम एक योग्य शासक साबित हुए। लोक कल्याण के कार्यों में समर्पित राजा रत्नदेव ने न केवल रतनपुर नगरी भव्यता प्रदान की अपितु उन्होंने स्थापत्य कला को अपने कार्यकाल में नई उंचाईयां दी। सन 1045 में तुम्मान के स्थान पर रतनपुर को राजधानी बनाया गया। रत्नराज प्रथम के देहावसान के पश्चात उनका पुत्र पृथ्वीदेव प्रथम 1065 ई. में रतनपुर राज्य के अधिपति बने। उन्हें सकल कौशलादिपति की उपाधि से विभूषित किया गया। उनके द्वारा प्रसिद्ध पृथ्वीदेवेश्वचर मंदिर बनाया गया था। कल्चुरी वंश की वंशावली विस्तारित होते हुए पृथ्वीदेव के पश्चात जाजल्यदेव प्रथम 1090 ई. में कल्चुरी वंश के नये राजा बने इनका शासनकाल 1120 ई. तक रहा। जाजल्यदेव के शासनकाल की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि इन्होनें बस्तर के छिंदक नागवंश के शासक सोमेश्वर को पराजित किया , साथ ही जाजल्वपुर नामक एक समृद्ध शहर को भी उन्होंने स्थापित किया , जिसे वर्तमान के जांजगीर के रूप में जाना जाता है।

त्रिपुरी के मण्डलेश्वर ने तुम्माण को अपना निवास स्थान बनाया। यह बिलासपुर जिले के एक सुरक्षित पर्वतीय स्थान हैं जिसे तुगान खोल कहा जाता हैं । तुम्माण का यह मण्डलेश्वर त्रिपुरी नरेश कोकळदेव के 18 पुत्रों में से था । इस कोकळ का समय 875 ई. स्थिर किया गया है। कोकळ के बनाये हुए मण्डलेश्वर का यह वंश 125 वर्षो तक तुम्माण में चलता रहा । उसके पश्चात वह निर्मूल हो गया तथा किसी दूसरे ने उस पर अपना अधिकार कर लिया। तब त्रिपुरी के राजा का एक और लड़का कलिंगराज नामक वहां भेजा गया। उसने न केवल तुम्माण को ही फिर से अपने अधिकार में किया वरन अपने बाहुबल से दक्षिण कौसल का जनपद भी जीत लिया , तुम्माण जाकर उसने अपने शत्रुओं का क्षय कर अपने पूर्वजो की राजधानी को अपना निवास स्थान बनाया और उसके वैभव में वृद्धि की ।

जाजल्यदेव के पुत्र रत्नदेव द्वितीय 1120 ई. में कल्चुरीवंश के नये शासक के रूप में कार्यभार ग्रहण किया और इनका शासन काल 1135 ई. तक रहा। इनके पश्चात पृथ्वीदेव द्वितीय वंश के अगले राजा हुआ। जिनका शासनकाल 1135 ई. 1165 ई. के मध्य रहा । पृथ्वीदेव द्वितीय कुशल प्रशासक योग्य सेनापति थे और यही वजह थी कि इस काल में कल्चुरी वंश की भौगोलिक सीमा का चहुं ओर विस्तार हुआ । इस के बाद 1165 ई.-1168 ई. के मध्य बहुत कम समय के लिये जाजल्यदेव द्वितीय कल्चुरी वंश के नये शासक बने। राजा जगदेवजाजल्यदेव द्वितीय के आकस्मिक निधन से उत्पन्न परिस्थितियों के मध्य 1168 ई. में कल्चुरीवंश के नये राजा बने और इनका शासनकाल 1178 ई. तक रहा। 1178 ई. में राजा जगदेव के पुत्र रत्नदेव तृतीय ने कल्चुरी वंश की बागडोर सम्हाली और इनका शासनकाल 1198 ई. तक रहा । 1198 ई. में राजा रत्नदेव तृतीय के मृत्यु उपरांत उनका पुत्र प्रतापमळ कल्चुरी वंश के नये शासक हुए । प्रतापमल्ल 1198 ई.-1225 ई. तक शासन किया और इसके पश्चात कल्चुरी इतिहास से संबंधित जानकारी का अभाव पाया जाता है और यही कारण है कि प्रताप मल्ल के उत्तराधिकारियों का क्रमबद्ध इतिहास अनुपलब्ध है।

कल्चरी राजाओं के बारे में आंशिक जानकारी देवगिरी के यादव शासकों के अभिलेखों से मिलती है। इस वंश के राजा कल्याणसाय और उसके उत्तराधिकारियों के बारे में , अगर हम इतिहास के पन्नों में देखें तो यह बात सामने आती है कि बाहरेन्द्र के पश्चात उसका पुत्र कल्याणसाय रतनपुर का राजा बना । बाबूरेवाराम की पाण्डुलिपि में कल्याणसाय का उल्लेख मिलता है।

शिव कुमार राय

भगवान सहस्त्रबाहु एवं उनका जीवन चरित्र

सोमवंश (चन्द्र वंश) का इतिहास अत्यंत प्राचीन है। इस वंश में अनेक प्रसिद्ध राजा हुए हैं जैसे - नहुष, ययाति, यदु, दिवोदास, पुरुरवा, हैदय आदि । इसी चन्द्रवंश में सहस्त्रार्जुन बड़े प्रतापी सम्राट हुए जिन्होंने अपने प्रताप और पराक्रम का प्रसार एवं अधिकार समस्त जम्बूद्वीप में किया । इनकी यशोगाथाएँ आज भी पुराणों में सर्वत्र भरी पड़ी है एवं इनका नाम सार्थक सिद्ध हो रहा है। जम्बूद्वीप सात द्वीपो से घिरे एक मुख्य द्वीप का नाम है। इसके विस्तार को 9 खण्डों में विभाजित किया गया है, जिसमें एक भारतवर्ष भी है।  महाभारत में पर्वत को घेरकर स्थित सप्त द्वीपों को ही जम्बूदीप कहा गया है। कुछ स्त्रोतों से ऐसा भी ज्ञात होता है कि मेरूपर्वत के चारों ओर जम्बू (जामुन) के वृक्ष स्तिथ होने के कारण ही यह जम्बूद्वीप के रूप में प्रख्यात् हुआ । 

हमारे देश में अनेक देवी-देवता पूजे जाते हैं यहीं नहीं , विदेशों में भी भारतीय देवी-देवता पूजे जाते हैं। जापान में देवी-देवता भारत के वयोवृद्ध संस्कृत विद्वान निकी थिमुराका के अनुसार जापान के सभी देवी-देवता भारत की ही देन हैं। ब्रम्हा, इन्द्र, गणेश, सरस्वती, रूद्र, पृथ्वी, सूर्य, सोम, कार्तिकेय सहस्रबाहु, कुबेर तथा यम आदि जापान में आज भी अत्यंत पूज्य माने जाते हैं। सहस्रबाहु नामक प्राचीन वेदकालीन देवता को जापान मे दया का देवता माना जाता है और उनका जापानी नाम है - क्वानोन। इनकी कई मूर्तियां जापान में है जिनमें निक्को और नारा के मंदिरों में स्थित मूर्तियां अत्यंत भव्य तथा सुंदर है बोधिसत्व को जापान में क्वानोन का हीं वंश माना जाता है और वहाँ के बौद्ध देवताओं में वह सर्वाधिक लोकप्रिय है। टोकियों जनपद के अशाकुंभ नामक स्थान में स्थित सहस्रबाहु अर्थात क्वानोन का मंदिर एक लोकप्रिय तीर्थ स्थल है। गतवर्ष पांच करोड से अधिक भक्तों ने उनके दर्शन किये थे।

नारा में संगतसुदों के मंदिर में ब्रम्हा (जापानी भाषा में बोन्टोन) और (वाई-शाकू) की मूर्तियां कला की दृष्टि से अपूर्व है । इस मंदिर का निर्माण सम्राट शोमू ने मार्च 733 ई. में कराया था इस क्षेत्र में केवल यही मंदिर है जो लगभग हजार बरसों से ज्यों का त्यों खड़ा हुआ है। इस मंदिर की प्रधान प्रतिमा सहस्रबाहु अर्थात् क्वानोन के रक्षक हैं, ब्रम्हा, इन्द्र और स्वर्ग के अन्य चार राजगण सहस्त्रबाहु की ग्यारह मुखों वाली एक प्रतिमा भी इस मंदिर में है। जिसके दर्शन जनसामान्य को किन्हीं विशेष अवसरों पर ही सुलभ हो पाते हैं।

राज राजेश्वर भगवान् सहस्त्रार्जुन का जन्म त्रेता युग में कार्तिक शुक्ल सात को हुआ था जैसा कि निम्वत् स्पष्ट होता है -

कार्तिकस्यपक्षे सप्रभ्याभानुवासरे श्रवणर्क्षे ,

निशानाथे निशीथे सुशुभेक्षणे ।

( महिष्मति माहात्म्य, अध्याय 12 लोक 3)

अर्थात - स्मृति पुराण के अनुसार कार्तिक मास, शुक्ल पक्ष सप्तमी दिन रविवार श्रवण नक्षत्र में जब चन्द्रमा अस्त हो रहा था, प्रातः काल ऐसे शुभमुहूर्त में भगवान जन्म हुआ था।

सुष्वे पद्मिनी साकुमार सूर्य सन्निभं ,

सहस्यार्क करं दिव्य सुप्रभ सुमुवेक्षण ।

( माहिमति माहात्म्य अध्याय 15 श्लोक 3 एवं 4)

अर्थात् - जिस प्रकार कमलिनी सहस्त्र किरणों से युक्त प्रभावन सूर्य को उदय होते अपने सुकुमारों के साथ खिल उठता है, उसी प्रकार से माता पद्मिनी प्रभावान तेजस्वी मुख वाले बाहों तथा सुन्दर हाथ वाले श्रीमन् सहस्त्रार्जुन को देखकर आनंद विभोर हो उठती है। वेद एवं पुराण में सहस्त्रार्जुन को अर्जुन, कार्तवीर्यार्जुन, सहस्रबाहु, हैहयनाथ आदि नामों से जाना जाता है। इनके पिता का नाम कृतवीर्य तथा माता का नाम पद्मिनी था। इनके पिता चार भाई थे - कृतवीर्य, कृतौजा, कृताग्नि एवं कृतवर्मा। इक्ष्वाकु वंश में रेनू नामक एक राजा थे उनकी कन्या रेणुका जमदग्नि नामक ऋषि को विवाही थी, रेणुका संबंध में सहस्रार्जुन की साली थी। रेणुका की बहिन सत्या सहस्रार्जुन की धर्मपत्नी थी। सहस्त्रार्जुन के सहत्र भुजाएं थी और उसने सहस्त्र वर्ष राज्य किया। इस वंश में यदु के तीन प्रपौत्र क्रमशः हेह, महाहय एवं वेणुहय हुए। जिनमें हैहय बड़े धर्मात्मा तथा यशस्वी थे। हैहय के प्रपौत्र महिष्मान थे। महिष्मान के नाम पर महिष्मति (वर्तमान महेश्वर जो नर्मदा नदी के तट पर स्थित हैं) नगरी बसायी गयी है जिसे हैहय नरेशों ने अपनी राजधानी बनाया। यह पश्चिमी निमाड़ जनपद (मध्यप्रदेश) में स्थित है। इसी हैहय वंश को कलचुरि वंश एवं चेदिवंश के नाम से भी जाना जाता है। भगवान सहस्त्रार्जुन ने अपने पराक्रम और प्रताप से सारे विश्व में अपने यश एवं बल का विस्तार किया तथा उन्होंने दस हजार यज्ञ किये।

न नूनं कार्तवीर्यस्व गति यास्यान्ति पार्थिवाः ,

यज्ञेर्दानैस्तपोर्भिवा प्रश्रवेण श्रुतेन च ।

अर्थात - कार्तवीर्य सहस्त्रार्जुन का ज्ञान, दान, तप, योग, विनम्र और विद्या में कोई भी राजा उनकी समता नहीं कर सकता था। महिष्मति (महेश्वर) में शिव मंदिरों के साथ-साथ भगवान सहस्त्रार्जुन का भी मंदिर बना हुआ है यहाँ जयंती आज भी प्रतिवर्ष कार्तिक शुक्ल सात को बड़े धूम धाम से मनाई जाती है। इन दिनो सहस्त्रार्जुन के मंदिर में 11 घृत के दीप जलाये जाते है जो अनवरत 10 दिनों तक प्रज्जवलित होये हैं । मंदिर में सर्वत्र दीप मालाएँ सजायी जाती है तथा सर्वत्र स्थानों में यज्ञ की धूम रहती है तथा सहस्रार्जुन के नाम का जप होता रहता है। मध्योपरान्त नगर में चारों ओर रथ यात्रा का प्रदर्शन होता है। इस अवसर पर यहां एक भव्य मेला लगता है जो 10 दिनों तक रहता है जिसे अवलोकनार्थ देश के विभिन्न भागों से बहुत से यात्री आते है और मनोकामना पूरी करते हैं तथा नर्मदा नदी से स्नान कर अपने आप को कृतार्थ मानते है। मध्यप्रदेश, राजस्थान, महाकौशल, गुजरात, महाराष्ट्र तथा कर्नाटक प्रदेशों में बड़े यून - धाम से इनकी जयंती मनायी जाती है।

कार्तवीर्याजुनों नाम राजबाहु सहसवान ,

येन सागर पर्यंता धनुषा निर्जितामाही ।

अर्थात - जिन्होंने अपार धनुष शक्ति से सातो सालों से घिरे धरती को विजय किया वह कार्तवीर्यार्जुन के नाम से विख्यात है। त्रेता युग में भगवान का आविर्भाव हैहय कुल में समाज की दुर्व्यवस्था को सुधारने हेतु हुआ था। आपको भगवान की उपाधि से विभूषित किया गया है। विष्णु पुराण के अनुसार छः गुण उनमें विद्यमान थे अर्थात संपूर्ण ऐश्वर्य, धर्म, यश, श्री, ज्ञान, एवं वैराग्य। इन छः गुणों को जो धारण करता है वह भगवान कहा जाता है। सहस्त्रार्जुन में महान जीवन शक्ति. ज्ञान, प्रकाश, बल, ऐश्वर्य, तप, त्याग, मानव शक्ति आदि गुणों का भण्डार था। वे दिव्य पुरूष एवं प्रकाश स्तम्भ महामानव थे, जिनके गुणगान से मनुष्य मात्र की आत्मा पवित्र होती है और विश्व कल्याण होता है तथा जिनके स्मरण मात्र से सुख संपदा, वैभव एंव ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है।

एक बार की बात है सहस्रार्जुन नर्मदा नदी में स्नान (क्रीड़ा) के लिए गये थे जैसा कि महाकवि कालिदास ने सहस्त्रार्जुन के हजार भुजाओं द्वारा रेवा नदी के जल को रोककर अपनी रानियों के साथ क्रीड़ा करने का मधुर उल्लेख किया है रावण भी दिग्विजय के लिये निकला परन्तु रावण एवं सहस्त्रार्जुन में घमासान युद्ध हुआ , युद्ध में रावण हार गया । जिसके कारण वह बंदी बनाया गया। रावण के पितामह पुलस्य ऋषि ने अपने नाती रावण को इस आश्वासन से छूटा ही लिया कि वह पुनः सहस्त्रार्जुन के सामने सिर नहीं उठायेगा । प्रायः सभी पौराणिक ग्रंथों में भगवान सहस्त्रार्जुन को विष्णु का सुदर्शन चक्रावतार कहा गया है, जिसका अर्थ है - शुभ दिन वाला महापुरुष।

भगवान् सहस्त्रार्जुन का प्रादुर्भाव ऐसे समय में हुआ था जब राष्ट्र विरोधियों के अत्याचार से पृथ्वी पर त्राहि - त्राहि मची हुई थी, उस समय भगवान सहस्रार्जुन ने अपनी त्याग, तपस्या और पराक्रम से जनता के संपूर्ण कष्टों का निवारण किया । उनके संबंध में नारद जी कहते है कि दान, यज्ञ , विनम्रता एवं विद्या में निश्चय ही कोई भी राजा कार्तवीर्यार्जुन ( सहस्त्रार्जुन ) की प्रगति को नहीं पा सकता है ।

वह इन गुणों में सर्वोपरि थे।

1. मुझे उत्तम ऋद्धि सिद्धि दीजिए

2. मोक्ष के विषय में मुझे ज्ञान दीजिए।

3. मेरे सहस्त्र बाहुएँ हो जाये जिनसे पॉब सौ बाण एक साथ छोड़ सकूँ ।

4. मेरे सहस्त्र भुजाएँ होने पर , घमण्ड से कभी अधर्म पर पैर रखने पर सज्जन पुरूष मुझ कुमार्ग से हटा दें।

5. मैं पृथ्वी का धर्म से जय और पालन करूँ ।

6. मैं युद्ध में विजय प्राप्त करके तथा हजारों शत्रुओं का नाश कर के अपने अधिक शक्तिशाली व्यक्ति के हाथों मारा जाऊं ।

7. आकाश, पृथ्वी, पर्वत, पाताल, स्वर्ग आदि में मेरी अव्याहत गति हो और जहाँ चाहूं वहाँ जा सकूँ ।

8. ‎मैं प्रवृत्ति-निवृत्ति दोनों ही मार्गो का ज्ञाता होऊं ।

9. मेरा धन-धान्य कोष सभी अक्षय हो अतिथि मेरे यहाँ से विमुख न लौटे।

10. मैं संसार में अपने समय का द्वितीय राजा होऊं ।

 

भगवान सहस्त्रार्जुन से सबंधित तंत्र-मंत्र, भजन, स्तुति एवं चालीसा भी है जिससे मनुष्य मात्र जप कर ऋद्धि-सिद्धि प्राप्त कर सकता है इसमें तनिक मात्र भी संदेह नहीं है। इनकी जयन्ती प्रतिवर्ष कार्तिक शुक्ल सप्तमी को मध्यप्रदेश, राजस्थान, महाकौशल, गुजरात, महाराष्ट्र, तथा कर्नाटक प्रदेश में बड़े धूम-धाम से मनाई जाती है।